कुछ करें न करें , कुछ कहें
न कहें , कहें तो किस को कहें क्यों है ये कश्मकश
मैं ऐसे सकुचाती सी , ऐसे
घबराती सी कर रही चिंतन ,
हर कोई गुम है खुद में ही किसी को किसी की कोई सुध नहीं
कश्मकश है क्या यही है जिंदगानी , क्यों अधूरी सी है हर एक कहानी
क्या रिश्ते-क्या नाते क्या दोस्ती और क्या यारी, हर एक को बस अपनी हस्ती है प्यारी
खोकर इस इक अहसास
में , बैठी हुई कर रही मैं ये मनन
गलत होता देखकर कुछ भी अंदर कुछ टूट सा जाता है , मन मेरा फिर उसी कश्मकश में उलझ जाता है
कुछ करें न करें , कुछ कहें न कहें , कहें तो किस को कहें क्यों है ये कश्मकश जीवन के अथाह ये थपेड़े भी इंसान को नहीं बदल पाए हैं
न जाने वो क्या चाह है ऐसी जो पूरी नहीं हो पाती है जीवन की ये अनसुलझी पहेली अक्सर मुझे रुलाती है
जिनको अपना समझा हर पल धोखा वहीँ से खाया है कश्मकश का ये खेल मुझे जाने कहाँ ले आया है
पल में रोती पल में हंसती जीवन के ये टुकड़े चुनती न जाने किस राह पे जाके रुकेगा ये खेल निराला
कुछ क्षण को ही सही आएगा नया उजाला चीर के इन घुप अंधेरों को मुझे दूर बहुत दूर कहीं है जाना जहाँ न हो ये मैल ह्रदय में बस प्रेम की गंगा बहती हो कुछ कहने कुछ करने में कश्मकश न मन में रहती हो बनावट का जहाँ न हो जो, जहाँ न हो दिखावट का
हर एक कोने में बस महकता जीवन हो , जीवन का हर एक कोना महकता हो कुछ करें न करें , कुछ कहें न कहें , कहें तो किस को कहें क्यों है ये कश्मकश.......ये कश्मकश .
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